जमुना के तट पर जब कृष्ण की मुरली बाजे रे,
मन के तन के हर कोने में प्रेम के सुर हैं साजे रे।
कृष्ण कन्हैया, नटखट मोहन, तुम ही प्रेम, तुम्हीं हो जीवन,
मन को तृष्णा-मुक्त बनाते, तुम सोए से भाग्य जगाते।
हे गिरधारी, कृष्ण मुरारी, तुम पर जीवन वारी-वारी,
मेरे मन को प्रेम से भरकर, तुमने सारी पीड़ा हारी।
करूँ प्रार्थना मन-मंदिर में, तेरी ही मूरत विराजे रे,
मन के तन के हर कोने में प्रेम के सुर हैं साजे रे।
तान मधुर मुरली की सुनकर, मन का संशय मिट जाए,
माया के घन अँधियारे में, आशा-किरण झिलमिलाए।
तेरे चरणों में वंदन कर, जीवन पावन हो जाए रे,
तेरी करुणा की छाया में, मोहन, हर दुःख अपना भागे रे।
करूँ प्रार्थना मन-मंदिर में, तेरी ही मूरत विराजे रे,
मन के तन के हर कोने में प्रेम के सुर हैं साजे रे।
मन भटके जब जीवन-पथ पर, तुम ही राह दिखाते हो,
नए-नए रूपों में आकर, फिर विश्वास जगाते हो।
टूटे सपनों की हर किरच को, नव-सृष्टि से रच जाते हो,
मन में आशाओं के पावन दीप नए फिर जलाते हो।
करूँ प्रार्थना मन-मंदिर में, तेरी ही मूरत विराजे रे,
मन के तन के हर कोने में प्रेम के सुर हैं साजे रे।
जमुना की शीतल लहरों में, छवि तेरी मुस्काती है,
वृंदावन की पावन रज भी, तेरी कथा सुनाती है।
इस जग के हर रूप में तेरी अनंत छवि दिख जाती है,
हर कण में तेरा ही दर्शन, हर श्वास तुझे ही गाए रे।
करूँ प्रार्थना मन-मंदिर में, तेरी ही मूरत विराजे रे,
मन के तन के हर कोने में प्रेम के सुर हैं साजे रे।