गुरु पूर्ण करते जीवन को,
मन-अंधकार को हरते हैं।
वे ज्ञान-चक्षु में आशा की,
नित नव-ज्योति को भरते हैं॥
जीवन तब पूर्णता के अद्भुत
अलौकिक सुख को पाता है,
जन्मों से भटका हुआ जीव
अपने घर को आ जाता है॥
अज्ञान-अपूर्णता के बंधन,
जो नागपाश-से जकड़े थे,
तृष्णा के तिमिर ये मोहपाश,
जो मन को दृढ़ता से पकड़े थे।
सब सहज सरलता से ही
विलुप्त हो जाते हैं,
जब गुरु-ज्ञान के सूर्य-तेज
जीवन में उजियारा लाते हैं॥
गुरुदेव! धन्य हुआ जीवन,
चरण-कमलों में शत-शत नमन।
जैसे अनंत के प्यासे ने
जीवन का अमृत पाया है,
वैसे ही ज्ञान के मोतियों से
आपने जीवन जगमगाया है॥
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